' साल गुजरता
मै भी बढ़ता,
सत्रह का हो जाउंगा।
कहा कौन सा
काम करूँगा,
क्या धंधा अपनाऊंगा ?'
भैया ने बातो बातो में बचपन की याद ताजा करा दी।
लींगलींग, नजानु और छोटे इवान की कहानिया मस्तिस्क में अब एक धुंधली तस्वीर की तरह है।
कुछ चेहरे याद है, कुछ वक्त की ओंस में खो गए।
इतना याद है की रूसी कहानियों में लोग पौ फटते ही काम पर निकल जाते थे और लींगलींग जब जोर जोर से दरवाजे पर दस्तक देता तो दरवाजा नही खोला जाता पर जब प्यार से खटखटाता तब उसकी दादी अम्मा दरवाजा खोल देती।
जी करता है सारे करेक्टर्स को खोजू , सारी कहानिया फ़िर से पढ़ डालू।
कल घर जा रहा हू , पापा की लाइब्रेरी में लींगलींग और नजानु को खोजने।
यादो को हम संजो कर रखते है। शायद इसलिए क्योकी वक़्त के साथ हम सभी बदल जाते है, पर यादे नही.
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3/9/09
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