4/11/10

जहा चाह , वहा राह



१ अप्रैल, २०१०
दुबई

आज से तक़रीबन १० साल पहले घुमक्कड़ो के लिए दुबई में शायद ही कोई आकर्षण होगा । अगर इतिहास की बात कीजिये तो इस शहर का इतिहास यही कोई १०० - १५० साल पुराना है और रेगिस्तान के बीचो बिच बसे इस शहर में ऐसा कोई प्राकृतिक सौंदर्य भी नहीं है जो सैलानियों को अपनी तरफ खिचे।
पर आज यहाँ जो भी है, शेखो ने दिया है , और कसम से, बहुत खूब दिया है !
विश्व की सबसे ऊँची इमारत, सबसे बढ़िया होटल, सबसे बड़ा अक्वेरियम , सबसे बड़ा शापिंग मौल; आज सबकुछ है दुबई के पास !
दुबई मुझे बचपन में खेले गए एक खेल की याद दिलाता है. मै अपने दोस्तों से पूछा करता था ( शायद कभी आपने भी अपनी किसी दोस्त से पूछा होगा ) - 'बोलो, अगर हम तुम्हे १ करोड़ रुपैया दे और रेगिस्तान में अकेला छोड़ दे तो क्या क्या करोगे? '

3/20/10

ब्रिटिश संघ्राहालय !

स्टोनहेंज !

७ मार्च ,२०१०
स्टोनहेंज , इंगलैंड


कहते है की अगर किसी चीज को दिलो-जान से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है।
अब दुनिया के १०० आश्चर्यो से इश्क सा हो गया है । और सिर्फ मै ही जिद्द कर उनसे मिलने नहीं जाता, वो भी अब मुझे बुलातीं है ।

1/18/10

वार्षिक रिपोर्ट - २००९

प्यारे पाठको ,

आशा है की 'आल इज्ज वेल ' होगा आपके साथ भी ।
दो दिन पहले की बात है मेरे एक पाठक ने मुझसे 'एक घुमक्कड़' चिठ्ठा का वार्षिक रिपोर्ट माँगा । उनका भी लोजिक सही था , बोले की घुमक्कड़ भाई बातें और प्लान तो बड़े बड़े बनाते हो , चलो ये तो बताओ की पिछले साल किया तुमने क्या ??
मैंने बोला की सरकार आप तो हमेशा मेरा ब्लॉग पढ़ते है, ये रहे मेरी पिछले साल के घुमक्कड़ी से रिलेटेड कुछ सवाल , चलिए आप ही गेस मारिये . और पाठको आप क्यों पीछे है ? चलिए आप भी गेस मारिये .
२१ जनवरी को सही जवाब कमेन्ट में पोस्ट कर दिया जाएगा ।










और हां , फ़ोनों फ्रेंड करना हो तो - +९१ ९ ० ० ७ ० ० ० ६ ७ ० डायल कीजिये !

1/2/10

37th आश्चर्य !

मै नहीं मानता की हिलमैन के १०० आश्चर्य ही वास्तविक १०० आश्चर्य है इस दुनिया के । ये तो घुमक्कड़ी की मार्केटिंग है । कई आश्चर्यो को अब तक किताबो में जगह नहीं मिल पायी है और कारण आपको - हमको सबको पता है ।

बिहार के गया जिले के निवासी, दसरथ मांझी ने अकेले ही गहलौर के पहाड़ी को काट कर ३६० फिट लम्बा , २५ फिट उचा और ३० फिट चौड़ा सड़क बना डाला था । ये काम करने में उन्हें २२ साल लगे। २२ साल तक एक हथौड़ा और एक छेनी ले कर के जनाब डटे रहे । क्या ये अपने आप में एक आश्चर्य से कम है ??

खैर , हिलमैन जी के अनुसार दुनिया का 37th आश्चर्य है - हांगकांग का स्काईलाइन । दुनिया के अच्छे स्काईलाइनों में हांगकांग का स्काईलाइन सबसे अच्छा माना जाता है । घुमक्कड़ को हांगकांग के स्काईलाइन के दर्शन का सौभाग्य १२ दिसंबर'०९ को मिला । इसके साथ ही इनके १६ आश्चर्यो के दर्शन पुरे हुए। ये जनाब १०० में से १०० देख कर ही मानेंगे !

12/31/09

ढाका डायरी

प्यारे पाठको ,
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !

पिछले कुछ चंद सफ़र के बारे में ये घुमक्कड़ आपको अपडेट नहीं कर पाया , माफ़ कीजियेगा - दौड़ लगाना पड़ गया था ।

कलकत्ता छोड़े हुए २ महीने हो चुके है । वहा की ट्राम , काठी रोल और आबो हवा की अब बहुत याद आती है । १.५ साल में कलकत्ता से बहुत अटैचमेंट हो गया । वहा थे तो गलियाते थे - वहा की धीमी ज़िन्दगी , उमस भरी गर्मी और लोकल तौर तरीके को; अब जी करता है एक बार और जाए , गले लगा ले शहर को और पूछे - 'कोलकाता, की होछ्छे ? की खोबोर ? '

नवम्बर के पहले हफ्ते में बिजनेस के सिलसिले में ढाका जाने का मौका मिला । कोलकाता से ढाका एक झपकी मारते ही आप पहुच जायेंगे । साल्ट लेक से एअरपोर्ट जाने में जितना टाइम लगा , उससे भी कम टाइम में कोलकाता से ढाका पहुच गए।

ढाका एअरपोर्ट से बाहर निकलते ही ऐसा लगा जैसे पूरा ढाका खड़ा हो । लोगो के भीड़ को चीरते हुए धीरे धीरे मेरी गाडी आगे बढ़ी और मैंने शुरु किया खिड़की से बाहर झाकना ।

ढाका में तक़रीबन साढ़े चार लाख रिक्सा रोज चलते है । 'रिक्सा कैपिटल ऑफ़ द वर्ल्ड ' के नाम से भी जाना जाता है ये शहर । यहाँ की सबसे बड़ी समस्या यहाँ की ट्राफिक है । ट्राफिक में घंटो फसे रहना आम बात है । १-२ घंटे अगर आप लेट से दफ्तर पहुचते है तो ये कोई नयी बात नहीं होगी। ५ दिन के बिजनेस ट्रिप में ट्राफिक का प्रकोप हमारे ऊपर खूब बरसा । एक बार १ बजे पिज्जा का आर्डर किया जो की २:४५ में मिला । पिज्जा हट और डोमिनोस के प्रोमिसेस यहाँ नहीं चलते । ज़िन्दगी धीमी है और यहाँ के युवा देश से बाहर निकलना चाहते है। बंगलादेशी बदनाम है इल्लेगल इम्मिग्रेसन के लिए । इस कलंक के कारण यहाँ के युवाओ को दुसरे देश का वीसा मिलने में भी काफी तकलीफ होती है ।

एक अमेरिकी के लिए ज़िन्दगी कितना आसान है और एक अफगानी , इराकी या बंगलादेशी के लिए कितना मुश्किल ? सरहदे गिरा देना और सभी को सामान अधिकार देना क्या एक उम्मीद नहीं ? कब जा कर हम कह सकेंगे की हम इस ग्रह में रहते है , इन देशो में नहीं ?