5/29/09

घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे

कौन सा गाना आपको घर की सबसे ज्यादा याद दिलाता है ?
जिसको सुनते ही आपकी आखों के सामने एक दृश्य उभर आता है? और कौन सा गाना
आपको घुमने के लिए प्रेरित करता है??
अपनी पसंद इस चिट्ठे के कमेन्ट में लिखिए और साथ ही अपने घर का पता
भी..क्योकि सबसे अच्छी इंट्री को मिलने वाला है 'एक
घुमक्कड़' की तरफ़ से एक ट्रेवल पोस्टकार्ड ;)

मेरी पसंद: घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे (दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे)।
खासकर ये चार लाइन :

"आज ही आजा गाता हँसता
तेरा रस्ता देखे रस्ता
अरे छुक छुक गाड़ी की सीटी आवाज़ लगाये रे
घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे "



3/13/09

ये पटना है मेरे यार

यहाँ शाम में लाली भी होती है
और सुबह ______ सी होती है

सोच क्या रहे है जनाब , फिल इन द ब्लैंक और शामिल हो जाईये कांटेस्ट में .
सर्वश्रेष्ठ सुझाव देने वाले को मिलेगा एक घुमक्कड़ की तरफ़ से पटना जाने का रेल टिकट, बिल्कुल मुफ्त!!!!

3/9/09

अ वाक डाउन द मेमोरी लेन

' साल गुजरता
मै भी बढ़ता,
सत्रह का हो जाउंगा।
कहा कौन सा
काम करूँगा,
क्या धंधा अपनाऊंगा ?'

भैया ने बातो बातो में बचपन की याद ताजा करा दी।
लींगलींग, नजानु और छोटे इवान की कहानिया मस्तिस्क में अब एक धुंधली तस्वीर की तरह है।
कुछ चेहरे याद है, कुछ वक्त की ओंस में खो गए।

इतना याद है की रूसी कहानियों में लोग पौ फटते ही काम पर निकल जाते थे और लींगलींग जब जोर जोर से दरवाजे पर दस्तक देता तो दरवाजा नही खोला जाता पर जब प्यार से खटखटाता तब उसकी दादी अम्मा दरवाजा खोल देती।

जी करता है सारे करेक्टर्स को खोजू , सारी कहानिया फ़िर से पढ़ डालू।
कल घर जा रहा हू , पापा की लाइब्रेरी में लींगलींग और नजानु को खोजने।

यादो को हम संजो कर रखते है। शायद इसलिए क्योकी वक़्त के साथ हम सभी बदल जाते है, पर यादे नही.

6/29/08

वेनिस !


एक ऐसा शहर जो आज भी वैसा ही है जैसा आज से १०० साल पहले था..
गोन्डोला की सवारी अगर करो तो, हर मोड पे एक नया द्रिश्य उभरता है.
एक द्रिश्य जिसको आप फ़िर सर घुमा के देखते है.आखें फ़ाड देखते रह जातें है.

5/24/08

जरमनी से स्कान्दिनैविया कि ओर


बर्लिन से डेनमार्क होते हुए स्टाकहोम जाने का प्लान था.. ट्रेन मे बैठे-बैठे हम और राजदीप गप्पे मार रहे थे.. राजदीप बातो से ज्यादा , खिडकी से बाहर के नजारो का मजा ले रहा था. ’ये देखो कितने सारे windmill' राजदीप ने इशारा करते हुए दिखाया.... बाहर झाकं के देखा तो चारो तरफ़ Swan और Windmills दिखें.
ठंढ बढने लगी थी ... जल्दी हि हम यूरोप मेनलैंड से स्कान्दिनैविया मे प्रवेश करने वाले थे. ट्रेन रुकी.. हमने सोचा कि ट्रेन से उतरकर Baltic Sea क्रॉस करने के लिए फेरी लेना होगा.
पर ट्रेन से बाहर उतरे तो पता चला कि we are already in a Ferry!! और हमारे ट्रेन कि जैसी और दो ट्रेने थी उस बडे Ferry मे.

5/9/08

जान्कोलाना कि कुछ यादें

यादों को अगर संजोया न जाए तो वे मिट जातें है!
आजकल कि भागदौड भरी जिदंगी मे; हम, आप और सबसे तेज,ये वक्त दौडता है...वक्त कि रफ़्तार सुनहरे यादों को धुंधली कर देता है...ऐसी हि कुछं धुंधली यादों पर से धुल झाडने कि, उसे चमकाने कि एक कोशिश...

यूरोप आने के बाद snowfall देखने कि एक तमन्ना थी...जो जान्कोलाना जा के पूरी हुई.
जान्कोलाना पहुचने के बाद, ट्राली से हमलोग Skiing Zone गए...
स्नो कि परत ह्ल्की थी..कभी कभी घुठनो तक धस जाते थे..
Kshitij से सूरज कि किरने आ रही थी..
उछ्ल कुद और मस्ती के बाद याद आया कि जल्दी रवाना होना पडेगा नही तो बस छुट जाएगी.
बस stand पहुचकर जब हम बस का इंतजार कर रहे थे तो ठंढ से कांप रहे थे..शाम हो गई थी.
ठंढ भगाने के लिए हमे दौडे.. फ़ुटबाल खेले और Hot गपशप मारे.. १ घंटे बाद बस आ गई और हम उदीने के लिए रवाना हुए..

इंडिया हो या यूरोप, ये universal truth है कि : बस कभी time पे नही आती.