9/13/09

वन नाईट @ रैन बसेरा

एक बार एक घुमक्कड़ यूरोपी पटना पंहुचे । अक्सर सैलानी गया और नालंदा जाने के लिए, पटना को 'गेटवे' की तरह इस्तेमाल करते है और देश विदेश से आने वाले सैलानी पटना में एक रात गुजार कर अगली सुबह गया या नालंदा के लिए अपनी यात्रा प्रारम्भ करना बेहतर समझते है ।

हमारे घुमक्कड़ यूरोपी, पूरे यूरोप , पश्चिमी और मध्य एशिया अपने कार से सफर करने के बाद भारत पधारे थे ।
भारत के सडको पे कार चलाना मुश्किल था उनके लिए , इसलिए कार को दिल्ली के एक गराज में रख , बस और रेल से भारत भ्रमण करने का उन्होंने निर्णय लिया था ।

शाम का वक्त था। पटना स्टेशन से बाहर निकलने के बाद हमारे घुमक्कड़ साहब कही टेंट लगाने की जगह ढूँढना शुरू किए । पटना में तो टेंट सिर्फ़ नीम हकीम लगाते है और वो भी दोपहर के वक्त गांधी मैदान में। कोई विदेशी अगर तम्बू गाड़ने की कोशिश करे तो जमघट लगने में २ मिनट का समय भी नही लगेगा।
लोगो की हरकतों से हमारे घुमक्कड़ साहब को समझ में आ गया था की यहाँ टेंट नही लगाई जा सकती और रात बिताने के लिए होटल जाना भी हमारे घुमक्कड़ साहब को गवारा था नही । अब सोए तो कहा सोए ? रेलवे स्टेशन के सारे प्लात्फोर्म भी हॉउस फुल थे । टौवाते रहे २-३ घंटा इधर- उधर ।
इत्तफाक से एक रिक्शे वाले की नज़र इनपे पड़ गई। रिक्शे वाले को समझ में आ गया था की जनाब को क्या चाहिए। इशारे - इशारे में सौदा पक्का हुआ । रैन बसेरा में एक रात गुजारने के लिए ४० रुपये ।
दिन भर के थके हमारे घुमक्कड़ साहब अपना स्लीपिंग बैग निकाले और सो गए रैन बसेरा में। हमारे घुमक्कड़ साहब तो घोडे बेच कर सो गए और इधर रातो रात पूरे शहर में हल्ला हो गया की एक विदेशी रिक्शे वालो के बिच रैन बसेरा में सो रहा है । कोई विदेशी लाचार होकर तो रैन बसेरा में सोयेगा नही , हो न हो ये इश्वर के अवतार है ।
गरीबो के मसीहा है ।
सुबह जब घुमक्कड़ साहब की नींद खुली, तो देखते है की सभी रिक्शे वाले उन्हें दंडवत प्रणाम कर रहे है। पूरे विश्व में श्रद्धा की एक ही भाषा होती है और पूरे विश्व में श्रद्धा और पागलपन के बिच की लकीर भी काफ़ी पतली होती है। रिक्शे वाले शायद हमारे घुमक्कड़ साहब को अवतार घोषित कर दिए थे । घबराए हुए से घुमक्कड़ साहब जल्दी -जल्दी अपना बोरिया बिस्तार समेटे और निकल लिए वहा से। डरे हुए से घुमक्कड़ साहब को शायद याद आ गया होगा की यहाँ भारत में बकरे को हलाल करने से पहले उसकी आरती उतारी जाती है।

8/17/09

भुने हुए टिड्डे (Grasshopper)

इस साल जनवरी में जब मै बैंकॉक में था तो रोड पे भुने हुए टिड्डे बिकते हुए देखा। ठेले पे भुने हुए टिड्डे वैसे ही बिक रहे थे जैसे अपने यहाँ चिनिया बादाम बिकता है ।

थोडी सी चखने की इक्षा मैंने जाहिर की और टिड्डे वाले ने मुझे दो टिड्डे दिए। मेरे साथी, सौम्या और सिम्पू फोटोकैमेरा ले तैनात होकर बोले "तू खा मै फोटो लेता हूँ"
मैंने आखें बंद की और ३..२..१..भुने हुए टिड्डे को चबाना शुरू किया।
बेहद कुरकुरे और स्वादिष्ट!! पर चबा करके टिड्डे को निगल नहीं पाया । गन्ने के तरह स्वाद ले करके थूकना पड़ा ।

टिड्डे और कीडेमकौडो में काफी प्रोटीन होता है और फैट बहुत ही कम , तभी तो उनकी strength/weight ratio काफी ज्यादा होती है और इतनी तेजी से उड़ पाते है ।
टिड्डे के अलावा, झींगुर, भौरा और बिच्छू भी लोग खाते है, सोया सॉस के साथ.
आपको अगर मौका मिले तो जरूर ट्राई कीजियेगा, और याद रहे टिड्डे और झींगुर के पैर तोड़ के खायीयेगा वरना गले में अटकेंगे !!

7/27/09

ओ माझी रे


पानियों में बह रहे हैं कई किनारे टूटे हुए ,
हो रास्तों में मिल गए हैं सभी सहारे छूटे हुए,
कोई सहारा मझधारे में मिले जो, अपना सहारा है...



7/18/09

मिशन - १ सफर, ६ महादेश और ४७ आश्चर्य



मिशन की तैयारी में पहला कदम १६ जुलाई २००९ को उठाया । एक सादे मैप में आश्चर्यो को चिन्हित कर दिया ।
तक़रीबन आधे घंटे लगे इस काम में। सफर करने में शायद एक साल लग जाए।
जनवरी २०१२ में ये सफर की शुरुआत करने की सोची है ।

आज मेरी मिटींग साइमन मोरेल्ली से है । साइमन पिछले ७ वर्षो से घूम रहा है और तक़रीबन आधी दुनिया की सैर कर चुका है । अभी उसका एस.एम.एस आया की आज शाम वो साल्ट लेक पहुँच रहा है। साइमन के अनुभव जानने के लिए उत्सुक हु । ७ साल !!! मजाक नही है!

मिशन के दौरान हर एक दिन दुसरे दिन से कितना अलग होगा । हर दिन सुबह उठो और ख़ुद को एक नए जगह पाओ । सोचो , अपने सारे जायदाद को त्याग कर सिर्फ़ चलते जाना , एक शहर से दुसरे शहर; एक देश से दुसरे देश, कैसा होगा ?

मिशन शुरू होने में अभी २ साल बाकी है और इस बीच एक लंबा सफर भी तय करना है । मिशन के तैयारी , मिशन से कम मुश्किल नही होगी।

7/15/09

सूपर कूल



- 15 degree celcius!

बिना वीसा मलेशिया की धरती पे



ये जो रेल की पटरी आप देख रहे है , ये है तो सिंगापूर में पर अमानत है मलेशिया की।
सिंगापूर के उत्तरी पश्चमी इलाके से गुजरती मलेशियन ट्रेन का सिंगापूर में पहला चेकपोस्ट बार्डर के काफ़ी अन्दर है।

मेरे ३ दिन के सिंगापूर यात्रा में मेरी दोस्त एरी ने मुझे ऐसी बहुत सारी बातें बतायी जो की दुसरे मुसाफिरों को नही पता होगी ;)
शुक्रिया एरी, सिंघपुरा से मुझे वाकिफ कराने के लिए ।

7/10/09

चेक-मेट




घुमक्कड़ बनाम लौरे रोसटचर , चेक रिपब्लिक